कई दिनों तक यही सिलसिला चलता रहा । और धीरे धीरे समय अपनी द्रुत गति से बढ़ता गया। लोगों ने उसके स्वभाव को परखा तो पाया की वह साधु बहूत विरक्त और त्यागी पुरुष था। लोग उसके बारे में तरह तरह के कयास लगाया करते , गाँव की चौपालों में सिर्फ उसी की चर्चा होती और वह इन सब से बेपरवाह घूमा करता, यूँ ही, उदास , मौन। धीरे धीरे लोगों में वह 'मौन साधु ' के नाम से मशहूर हो गया । इस तरह महीनों बीत गये उसे इस गाँव में आये और संयोग वश इतने महीनों से गाँव एक बार भी किसी भी भौतिक या प्राकृतिक आपदा का शिकार न हुआ । भोले भाले गाँव वालों ने यह समझ लिया की यह उसी साधु का चमत्कार है । आस्था को अंधविश्वास में बदलने में के लिये जरा भी समय नहीँ लगता ।वह साधु अभी तक गाँव वालों की श्रद्धा का पात्र तो था ही अब पूज्य भी हो गया । कुछ बुजुर्गों ने फिर कयास लगा करा एक नयी टिप्पणी की कि ये साधु जहाँ भी जाता है वहाँ खुशहाली ही खुशहाली रहती है । फिर क्या था सारे गांववालों ने मिलकर मंत्रणा की कि क्यों न इस साधु को अपने गाँव में ही रोक लिय जाये ताकि इस संत का कृपालाभ हमेशा उन्हे मिलता रहे । फिर एक दिन गाँव वालों ने मिलकर नदी के किनारे विशाल वट वृक्षों के झुरमुट में उसके लिये एक झोपडी बना दी और कुछ टूटे फूटे सामान का बंदोबस्त करा दिया । भोजन की जिम्मेदारी गाँव वालों ने अपने ऊपर ले ली । उनमे से प्रतिदिन कोई न कोई यथा सामर्थ्य जो भी रूखा सूखा जुटता , ले जाकर साधु की कुटी पर रख आता । और वह साधु जो पूर्ववत घूमता रहता था अब भी सारा दिन प्रकृति की गोद में घूमता ही रहता, पर अब उसे भी एक ठिकाना मिल गया । जहाँ अपनी यात्रा से थककर वह आता और रखे हुए भोजन को पेट में डाल कैद हो जाता अतीत की परछाइयों में , कभी हँसता तो कभी जोर जोर से रोता और इस स्मृति साधना में रत वह सौ जाता फिर अगली सुबह की प्रतीक्षा में ।.....................
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शांत, सुरम्य नदी की शीतल रेती पर छिटकती चाँदनी मानो स्वयम की शुचिता पर इतरा रही है । आकाश पर विद्यमान तारों की मंडली मानो इस सुंदर श्सॄष्टि को देख बालकों की तरह आनंदित हो चमक रहे हैं । पावन सरिता की जलधारा मानो कल कल का सुरीला गान कर रही है । प्रकृति की समस्त सुंदरता मानो रात्रि की इस बेला में इस निर्जन तट पर मूर्तिमान हो नृत्य करा रही है । न कोई कोलाहल न कोई उद्वेग , मालूम पड़ता है पीट हिमालय ने अपनी पुत्री इस नदी को जो शांति उपहार स्वरूप दी होगी वो समस्त शांति इस नदी ने इस तट पर ही सम्हाल करा रख छॊडी है । तभी तो आज इस नदी के पुलिन पर हिमालय की शांति की अनुभूति हो रही है । केवल बीच बीच में दूर किसी गाँव में कुत्तों के भौंकने का स्वर ही किसी प्राणी के उपस्थित होने की सूचना देता है ।
नदी की धार के बिल्कुल समीप एक विशाल वट वृक्ष पूरे गर्व के साथ खडा हो इस दृश्य का साक्षी बन इसकी सुंदरता को और बढा रहा है । जिसकी शाखाओं के निवासी पक्षियों में से अधिकतर या तो निद्रामग्न है या उस स्वर्गिक दृश्य को देख पुलकित हो स्तब्ध बैठे हैं । ऐसा लग रहा हैं मानो उस स्थान पर उपस्थित प्रत्येक वस्तु को धवल चंद्रमा ने अपनी पवित्र रश्मियो से धोकर और भी स्वच्छ व निर्मल कर दिया हो । कुल मिलाकर एक अकल्पनीय , अविश्वसनीय और अप्रतिम दृश्य हैं ।
उस विशाल वृक्ष के नीचे ही वह साधु ध्यान की मुद्रा में निर्विकार , शांत मूर्तिवत बैठा हुआ मानो आनँद की किसी अदृश्य धारा में गोते लग रहा था । प्रमाण थे उसकी आँखों से झरते अश्रु बिंदु जो उसकी स्वर्णिम आभा को और बड़ा रहे थे ।
सहसा वृक्ष की किसी शाखा पर किसी परिंदे ने अपन स्थान बदला तो पत्तों के खड्खडाने का धीमी सा स्वर हुआ । साधु ने धीरे धीरे अपने नेत्र खोली । आँसुओं से तर अपने चेहरे को पोंछा और एक गहरी साँस लेकर उठ खड़ा हुआ । सामने नदी की धारा अपने वेग से वह रही थी । साधु धीमी गति से चलता हुआ किनारे पर बिछी हुई रेत तक आया । कुछ डेढ़ यूँ ही खडे खड़े उसने चारों और की सुंदरता को देखा फिर वही बैठ गया । उसका मन पुलकित होने लगा , रोम रोम रोमांचित हो उठा । वह अपलक उस जल धार को निहारने लगा । अचानक उसके कानों में एक चिर परिचित ध्वनि गूँज उठी................
क्रमशः..............
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शांत, सुरम्य नदी की शीतल रेती पर छिटकती चाँदनी मानो स्वयम की शुचिता पर इतरा रही है । आकाश पर विद्यमान तारों की मंडली मानो इस सुंदर श्सॄष्टि को देख बालकों की तरह आनंदित हो चमक रहे हैं । पावन सरिता की जलधारा मानो कल कल का सुरीला गान कर रही है । प्रकृति की समस्त सुंदरता मानो रात्रि की इस बेला में इस निर्जन तट पर मूर्तिमान हो नृत्य करा रही है । न कोई कोलाहल न कोई उद्वेग , मालूम पड़ता है पीट हिमालय ने अपनी पुत्री इस नदी को जो शांति उपहार स्वरूप दी होगी वो समस्त शांति इस नदी ने इस तट पर ही सम्हाल करा रख छॊडी है । तभी तो आज इस नदी के पुलिन पर हिमालय की शांति की अनुभूति हो रही है । केवल बीच बीच में दूर किसी गाँव में कुत्तों के भौंकने का स्वर ही किसी प्राणी के उपस्थित होने की सूचना देता है ।
नदी की धार के बिल्कुल समीप एक विशाल वट वृक्ष पूरे गर्व के साथ खडा हो इस दृश्य का साक्षी बन इसकी सुंदरता को और बढा रहा है । जिसकी शाखाओं के निवासी पक्षियों में से अधिकतर या तो निद्रामग्न है या उस स्वर्गिक दृश्य को देख पुलकित हो स्तब्ध बैठे हैं । ऐसा लग रहा हैं मानो उस स्थान पर उपस्थित प्रत्येक वस्तु को धवल चंद्रमा ने अपनी पवित्र रश्मियो से धोकर और भी स्वच्छ व निर्मल कर दिया हो । कुल मिलाकर एक अकल्पनीय , अविश्वसनीय और अप्रतिम दृश्य हैं ।
उस विशाल वृक्ष के नीचे ही वह साधु ध्यान की मुद्रा में निर्विकार , शांत मूर्तिवत बैठा हुआ मानो आनँद की किसी अदृश्य धारा में गोते लग रहा था । प्रमाण थे उसकी आँखों से झरते अश्रु बिंदु जो उसकी स्वर्णिम आभा को और बड़ा रहे थे ।
सहसा वृक्ष की किसी शाखा पर किसी परिंदे ने अपन स्थान बदला तो पत्तों के खड्खडाने का धीमी सा स्वर हुआ । साधु ने धीरे धीरे अपने नेत्र खोली । आँसुओं से तर अपने चेहरे को पोंछा और एक गहरी साँस लेकर उठ खड़ा हुआ । सामने नदी की धारा अपने वेग से वह रही थी । साधु धीमी गति से चलता हुआ किनारे पर बिछी हुई रेत तक आया । कुछ डेढ़ यूँ ही खडे खड़े उसने चारों और की सुंदरता को देखा फिर वही बैठ गया । उसका मन पुलकित होने लगा , रोम रोम रोमांचित हो उठा । वह अपलक उस जल धार को निहारने लगा । अचानक उसके कानों में एक चिर परिचित ध्वनि गूँज उठी................
क्रमशः..............








