Friday, February 19, 2016

स्मृति-साधना

नवीन मिश्र*
नदी के किनारे एक वीरान सी जगह पर बनी हुई फूस की एक झोपड़ी और झोपड़ी में बेतरतीब फैली हुई किताबें, सामान के नाम पर एक छोटी सी टूटी हुई मेज और कोने में रखे हुए कुछ पुराने बरतन मानो मुँह चिढ़ा रहे थे। झोपड़ी की कच्ची फर्श पर बिछी हुई पुरानी सी चटाई पर बैठा हुआ शख्स छत को घूर रहा था। बढ़ी हुई दाढ़ी और बिखरे हुए लम्बे बाल। देखनेवाले अगर उसे साधु की संज्ञा देते तो ये गलत न होता। उसक चेहरे पर व्याप्त तेज उसकी शख्सियत को और प्रभावााली बना रहा था। न जाने कितनी देर से वह यूँ ही पड़ा मानो छत के पर्दे पर अतीत के चित्रों को निहार सा रहा था और आँसुओं की कुछ बूंदें उसकी आँखों में जगमगा रही थी।

‘क्या कभी सोचा था कि ये हश्र होगा उसका?’कल का  एक होनहार, काबिल और खुद्दार शख्स गुमनामी के उस अज्ञातवास को झेलते-झेलते मानो खुद से भी अपरिचित हो चुका था। उसकी दिनचर्या- सुबह उठकर कुछ न कुछ पेट में डालकर जुट जाता कलम उठा कर लिखने में और लिखता रहता तब तक, जब तक उसकी आँखों के आगे अँधेरा न छा जाता फिर पेट की आग को किसी न किसी तरह शान्त कर खो जाता अपने उसी प्रेरणा स्रोत, अपने स्वप्न्लोक में । और यह सिलसिला यूँही चलता रहता देर रात तक। फिर उसी झोपड़ी के किसी कोने में लुढ़क कर ख्वाबों, सोचों की दुनिया में खोया रहता और नींद का इन्तजार करता रहता। मगर नींद तो जैसे एक बार जाकर उसे भूल जाती। न जाने कितनी बातें थीं, अनकही हुई जो उसके मन में घूमती रहती, उमड़ती रहती और वह अपने मन को तसल्ली या यूँ कहें कि भुलावा देने के लिए उन्हें कागज पर उतारा करता।

पड़ोस के गाँव वाले जिनके लिए वह कोई सिद्ध पुरूष था, उसके खाने का कुछ न कुछ बन्दोबस्त कर देते। कभी कोई कुछ दे जाता तो कभी कोई कुछ। किसी किसी दिन तो भोजन के नाम पर पास बहती हुई दरिया का पानी ही उसके काम आता। कुल मिलाकर नरक सी जिन्दगी, मगर वाह री तृषणा  इन मायूसियों में भी न जाने कौन सी शक्ति थी जो उसे न सिर्फ जीने को प्रेरित करतीं अपितु उसे जिन्दा रहने में मदद भी करतीं। न पैसा पास न कोई आय का साधन, न कोई  ख़ुशी न कोई  उत्साह, बस मन में बीते पलों का एक बवण्डर और आँखों में झिलमिलाते आँसू- यही उसकी दौलत थी।

डेढ़ बरस पहले वह उस गाँव में आया। वही बढ़ी हुई दाढ़ी, लम्बे बिखरे बाल, लम्बी कद काठी और सुगठित युवा शरीर, आँखों में दुनिया भर का गम ऐसा कि उसे देखने वाले भी मानो किसी अनजानी शक्ति से प्रेरित हो रो देते। मानो उसका चेहरा ही दुख की ऐसी किताब था जिसको पढ़ने की बात छोड़ो एक नजर डालने वाले भी रो पड़ते। लोगों को उस पर बड़ी दया आती। गाँव के मासूम लोगों ने लाख उसका अतीत जानना चाहा मगर उसने अपना नाम तक न बताया। सुबह शाम इधर-उधर घूमा करता। कहीं पड़ोस के जंगलों में निकल जाता और भटकता रहता अपनी अनजान मंजिल की तलाश में। भूख लगती तो फिर गाँव आता और बैठ जाता किसी के भी दरवाजे पर, गृहस्वामी उसे कुछ न कुछ खाने को दे देता और वह स्वार्थी खाकर यूँ ही उठकर फिर निकल जाता कभी जंगल की ओर तो कभी नदी की ओर। लोग समझते कि वह कोई देव मानव है जो ईवर की भक्ति में लीन हो संसार को भूल चुका है और फिर यह चर्चा जल्द ही सारे गाँव में फैल गई। वो अनायास ही लोगों की श्रृद्धा का पात्र बन गया।



*लेखक कुरसथ के होनहार चित्रकार, गायक, लेख़क और शायर हैं. भागवत कथा में ख्यातिप्राप्त! अभी देहरादून में निवास! वहाँ एक व्यक्तिगत संस्था में काम करने के साथ-साथ प्रतिभावान(६वीं-१२वीं तक) गरीब छात्र-छात्राओं को मुफ़्त दैनिक शिक्षा देते हैं।

4 comments:

  1. मिश्रा जी आपको मेरा नमन है. ऐसे ही गाँव का नाम रोशन करते रहें.

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  2. हमेशा की तरह ही शानदार लेखन शैली नवीन जी ।

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