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| प्रतिवेन्द्र सिंह* |
विज्ञान और टेक्नोलॉजी जितनी रफ़्तार से ही आगे बढ़ रही है उतनी ही रफ़्तार से धर्म, जातियां और वर्ण व्यवस्था समाज में कट्टरता को बढ़ावा दे रहे हैं.
एक तरफ सपने है डिजिटल इंडिया #DigitalIndia, मेक इन इंडिया #MakeInIndia, स्टार्टअप इंडिया स्टैंडअप इंडिया #StartupIndia #StandupIndia, और दूसरी तरफ लोगो की पाखंडवाद और अंधविस्वास में बढ़ती रूचि।
यह सभी जानते है की कर्म ही सबसे बड़ा धर्म है फिर भी रोज कुछ न कुछ नया पाखंड देखने को मिल ही जाता है जिनका कर्म से कोई ख़ास सरोकार नही।
रोज नए बाबा पैदा हो रहे रोज नयी देवी देवता बन रहे । धार्मिक व्यवसाय जोरो-सोरो पर है।
कानपुर से दिल्ली के रास्ते में लगभग 40 से 50 किलोमीटर तक राष्टीय राजमार्ग (NH) पर लोगो के अंधविस्वास का एक उदाहरण देखने को मिलेगा। कोई देवी श्री कैला देवी जी के दर्शन के लिए लोग पैदल चले जा रहे थे कइयो जगह तो बूढ़े बच्चे जिनसे ठीक से चला नही जा रहा वो लोडर/ ठेलिया को पकड़ कर उसके सहारे अंधे बने चले जा रहे थे। दुःख होता है ऐसे हमारे देश की ऊर्जा का गलत दिशा में बरबाद होते देखकर।
यही ऊर्जा अगर वह सभी अपने व्यवसाय या खेतो में सुचारू रूप से लगाये तो उनका कल्याण तो होगा ही साथ ही देश भी तरक्की पर होगा। फिर न तो उन्हें कभी आत्महत्या करनी होगी और न ही किसी मूर्ति पर सर पटकने की जरूरत होगी। अगर पूजना ही है तो प्रकृति को पूजें, अपने खेतो को पूजें, अपने माता पिता को पूजें, मानवता को पूजें या अपने कर्म को पूजें।
""जो मन चंगा तो कठौती में गंगा""
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन"
(कर्म करने पर तो तुम्हारा अधिकार है, फल की इच्छा मत करो । फल आपके कर्मो पर ही आधारित है।)
(कर्म करने पर तो तुम्हारा अधिकार है, फल की इच्छा मत करो । फल आपके कर्मो पर ही आधारित है।)
हमारे धर्म ग्रन्थ भी यही सिखाते है। धर्म और कर्म को अगर एक ही वाक्य में पिरोया जाये तो मायने बदल जाते है।
1. धर्म ही कर्म है।
धर्म के नाम पर कुछ लोग जो व्यवसाय कर रहे है उनके लिए तो यह सत्य है परंतु सारभौमिकता नही है इसमें।
धर्म के नाम पर कुछ लोग जो व्यवसाय कर रहे है उनके लिए तो यह सत्य है परंतु सारभौमिकता नही है इसमें।
2. कर्म ही धर्म है।
यही सारभौमिक सत्य है जिसे हर एक धर्म और सम्प्रदाय अपने अपने ग्रन्थो में समायोजित किये है।
यही सारभौमिक सत्य है जिसे हर एक धर्म और सम्प्रदाय अपने अपने ग्रन्थो में समायोजित किये है।
मेरे विचार से अनपढ का कट्टर होना उतना नुकसान दायक नही जितना की पढ़े लिखे लोगो का होना है। लोगो को अपनी ऊर्जा सही एवम् उचित दिशा मतलब अपने कर्मो में लगानी चाहिए।
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*लेखक Kursath Yuva Manch, Hardoi के Founder हैं. हाल फिलहाल वे University of Incheon, South Korea के पीएचडी स्कोलर रहे हैं. कई सामाजिक संस्थाओं में वालंटियर हैं. "मेरे विचार से " उनके लेखों की एक श्रंखला है। जिसके द्वारा वे अपने विचार प्रस्तुत करते हैं. आपसे निवेदन है कॉमेंट में अपने विचार जरूर लिखे। इस श्रंखला की अगली कड़ी जल्द आप सभी से साझा होगी।
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Superstition and religion has become a profitable business now a days.Here chances of making loss is very less and profit starts from day one. Infact to encash religious feelings /to make people fearful out of superstition is the most promising business mantra.
ReplyDeleteI agree 100% ma'm . Thank you very much ma'm for your valuable comment.
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